देश की करंसी की कीमत कम या ज्यादा क्यू होती है?

देश के आजाद होने से पहले भारत के इकोनॉमी पर ब्रिटिश राज का प्रभाव था यही वजह थी के 1947 में जब भारत आजाद हुआ तो भारत के एक रुपए की कीमत एक डॉलर के बराबर थी।

भारत में आजादी के बाद आये राजनितिक और आर्थिक आये बदलाव के चलते रुपए की चाल धीरे धीरे कमजोर होती  गई।  असल में आजादी के वक़्त भारत पे कोई कर्ज़ा नहीं था लेकिन भारत को आगे बढ़ने केलिए पैसो की जरुरत थी|लेकिन जब साल 1951 में पहेली  पंच योजना लागु की तो भारत को विदेश से कर्ज़े की जरुरत पड़ी |

 जिस की वजह से भारत सर्कार को भारतीय रुपए की कीमत को कम करना पड़ा रुपए की कीमत को कम करने की मुख वजह थी फॉरेन इन्वेस्टमेंट को बढ़ावा देना और साथ ही साथ एक्सपोर्ट को बढ़ावा देना ताकि फॉरेन रिज़र्व को बढ़ासके |

उदाहरण : भारत के रुपए की कीमत कम होंगी तो अमेरिका में बैठा इंसान भारत से ज्यादा चीजे खरीद पायेगा यही कारण है की एक्सपोर्ट को बढावा देने के लिए कोई भी देश अपने कर्रंसी के वैल्यू कम कर देता है |

 आजादी के बाद भारत ने फिक्स्ड ए्कसचेज रेट  सिस्टम अपनाया इस सिस्टम के तहत सरकार तय करती थी की भारत के रूपये की  कीमत डॉलर के मुकाबले क्या रखी जाये इस सिस्टम के  वजह से १९४८ के बाद डॉलर के मुकाबले रूपये की कीमत ४.७९ पैसे के आस पास हो गई |

 फिर आया १९६२ और १९६५ की जग का दौर १९६२-१९६५ के बाद खस्ता हाल हुई भारतीय रिज़र्व फिर अर्थव्यवस्था को संभाल  ने के लिये भारत सरकार को फिर से अपने  रूपये को “डी वैल्यू “करना पड़ा और फिर १ डॉलर की कीमत  ७ रूपये तक पहोच गई असल में उस वक्त भारत को विदेश से हथियार ख़रीदनक पड़ा |

जिसकी वजह से फॉरेन रिज़र्व में  कमी आगई  और इसी वजह से इंडिया को अपने रूपये के कीमत को डी वैल्यू करना पड़ा साल १९७१ में भारतीय रूपये का लिंक ब्रिटिश पाउंड्स से ख़तम कर दिया गया और रूपये को सीधे डॉलर के साथ जोड़ फिया गया |

इसके बाद १९७५ तक रूपये डॉलर के मुकाबले गिरता गया और १ डॉलर के मुकाबले रूपये ८. पैसे कम हो गए | और साल १९८५ आते आते १ डॉलर की कीमत १२ रूपये थी फिर आया साल १९९१ जो भारत की व्यवस्था पर काफी भरी पड़ रहा था ज्यादा महगाई और विकास की कमी ने भारतीय अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी थी |

और भारत का फॉरेन  रिज़र्व सुख चूका था रिज़र्व के भंडार को जिन्दा रखने के लिए भारत को रूपये को फिर डी वैल्यू करना पड़ा इस वजह से १९९१ में १ डॉलर की कीमत १९. पैसे पर पहुच गई |

सरकार ने साल १९९३ में फिक्स्ड एक्सचेंज के जगाह फेक्सीबेल एक्सचेंज की पालिसी अपना लि यानी  डॉलर की कीमत बाजार तय करेगा इस पालिसी के बाद रूपये में काफी गिरवटे आई अब १ डॉलर के बदले ३१. रूपये चुकाने पड रहे थे।  

साल २०१० आते आते १ डॉलर = ४५ रूपये पर कर चूका था इसके बाद डॉलर ने कभी पीछेमुड कर नही देखा साल २०१३ तक १ डॉलर की कीमत = ६३ रुपये पार कर चुकी थी |

और आज साल २०१८ में मोदी सरकार और  RBI  के तमाम कोशिशों के बाद भी १ डॉलर की कीमत = ६९ रुपये तक पोहोच चुकी है असल में रूपये कीमत इन बातो पर निर्भर करती है महगाई, रोजगार, व्याज दर, ग्रोथ रेट, व्यापारिक घाटा, मार्किट का उतर चढ़ाव |

चलिए इसको थोड़ा गहराई से समझते है जिस देश की  कर्रंसी ज्यादा है उस देश की कर्रंसी मजबूत होती है अगर उस देश की फॉरेन रिज़र्व में कमी है आती है तो उस देश में भी कमी आती है फॉरेन रिज़र्व जुड़ा होता है एक्सपोर्ट और इम्पोर्ट से जो देश इम्पोर्ट ज्यादा करता है |

(यानी बाहेर से ज्यादा चीजे खरीदते है उसका फॉरेन रिज़र्व कम हो जाता है ) जिसकी वजह से उसकी करंसी की वैल्यू कम होती है और वही जो देश की करंसी के कीमतों में बढ़ोतरी होती है लेकिन उसमें सरकार को बॅलन्स करके चलना पड़ता है |

 क्योकी  अगर देश की करंसी मजबूत होगी तो बाहरी देश उससे सामान कम खरीदेगा जिससे एक्सपोर्ट में कमी आती है इस एक उदाहारण  के जरिऐ समझते है। मान लिजीऐ १ डॉलर कि कीमत ५० रुपये तो अमेरिका का बिज़नेस मैन जो  इंडिया से माल ख़रीदता है।

 वो एक डॉलर देकर कम चीजे खरीद पायेगा वही १ डॉलर के कीमत ५० रूपये हो जाती है।  तो वो ज्यादा माल खरीद पायेगा ये तो हुई इम्पोर्ट और इम्पोर्ट की बात अब बात करते RBI के इंटररेस्ट रेट की अगर डपोस्टिस पे  इंटेरेस्ट रेट  हाई होता है।

 तो विदेशी लोग ज्यादा इन्वेस्टमेंट करेंगे वही अगर इंटेरेस्ट रेट कम होता है।  तो फॉरन इन्वेस्टमेंट में कमी आएगी। अगर बात रूपये की करे  तो उसमे कमी आई है।

 तो वो कच्चे तेल की बदलती कीमते  जिसकी वहज से सरकार को विदेशी  कर्रंसी ज्यादा पे करना पड रहा है।जिसकी  वहज से फॉरन रिज़र्व में कमी आ रही है।

 दूसरा कारण करंट अकाउंट डेफेसिट (चालू खाता घाटा) जो २०१९ तब २.५%की दर से बढ़ने का अुनुमान  है।करंट अकाउंट  डेफेसिट होने का मतलब है।

 इम्पोर्ट के लिये की गई पेमेंट एक्सपोर्ट  से पैसे से ज्यादा जिसका सीधा मतलब है।  फॉरन रिज़र्व में कमी आना और रूपऐ की रेट में गिरावट आना इंटरनेशनल मार्किट में डॉलर की बढ़ती डिमांड भी रूपऐ के कमजोर होने का अहम कारण है।

 खैर अब देखना ये है की गिरती कीमत के लिये मोदी सरकार और  RBI क्या सख्त कदम उठाती है या यही डॉलर ७० का आकड़ा पार  कर देगा |

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